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‘माँ जी च्या बणि गे? अब उठ लेदि, चाय पीले। बुबाजी थै मि चाय दे। ज्वान लड़की ‘सुशीला’ ना सुबेर ल्हेकि अपणी माँ सावित्रि थैं उठालीका बोले। सावित्री अपणी आँख मीनदी-मीनदी उठीका बेटी सुशीला का सिर मा हाथ धरीका बोले- ‘‘शाबास’’ मेरि सुशीला! तु बाप की बड़ी सेवा कनीं छई, भगवान् त्वेथई भलो वर दियां, भगवान, ओ दिन कब आलू, जब मि उपणि लाटिथैं हल्दि कु असनाण द्यूंलु?’’ इन बोलदा बोलदा – उठीका बेटी का साथ रसोड़ा मा चली गया। बेटी ना द्वी गिलासों मा चाय धरे, सावित्री चाय का गिलास पकड़ी का पति का कमरा मा गैयी। अपनो पति ‘सीताराम’ का हाथ मा चाय का गिलास पकड़ाई का अपना आप भी ऊँका चारपाई मा बैठीका चाय पीणामा लगी गैयी। चाय पीन्दा पीन्दा बोली – “सुशीला का पिता जी? ई बेटि का भोरा हम बड़ो सुख भोगणा छवां, पर जब ईको ब्याउ होइ जालों तब क्य करला? ह्वे छैं कखि वीका सम्बन्ध मा बात चीत?’’
सीताराम ना चाय की घूँट मारदा मारदा बोले – ‘‘सुशीला की माँ? बात ता एक जगा चलणी छः, घर बर भी ठीक छः पर ऊँका साथ मा ताण तणणी मुश्किल छः। हमरि या एक ही नौनि छः ओ सोचणा छई कि मालताल भैत मीललु पर हमारा पास लड़कि का अलावा क्या छः? सुशीला जरा संवलु वरण कि भि छः ऊँका पसन्द आन्दि छ कि नि आन्दि?‘‘ सावित्रि ना पूछे- ‘‘पैलि इनु त बताओ कि कुछैं ओ लोग?‘‘ कनु मवशु छ? कनु लड़का छः? पहाड़ का जोशी लोगु कु एक मंवशु दिल्ली सरोजनी नगर मा बस्यूं छ। रामानन्द जोशीन नाम छ ऊँको, जौकों लड़का दिनेश ओवरयिरि कोर्स मा रूड़की पढ़णों छ। वो भला सम्पन्न लोग छई। शान शौकत से रन्दीई, ऊँका वास्ता दिल्लि म ही कई लड़कि छै, पर ओ पहाड़ का ही कै खानदानी मवासा से सम्बन्ध करणा चाणा छै। हम लोग भि गढ़वाल का बमणि गाँव मा ढौड़ियाल जाति का खानदानी पुरांणा मवाशा ता छई छवां, पर गरीब छवां, दिल्लि शादी मा दीणकु हमारा पास क्या छः। ये वास्ता मि ‘हां’ नि बोलि सकणों छौं। बेज्जति ह्वे जालि त कख जौंण? ‘‘ इनो बोलदा सीताराम ना सावित्री का मुख पर नजर डाले, सावित्र ना बोले- सुशीला का पिता जी! घबराओं न, सब ठीक ह्वे जालु, हमरि सुशीला ना हाई स्कूल पास करियाले। जवान भि ह्वेगे, ब्यवाणि जरूरी छ‘ योे अच्छो घर-बर मिलणों छः इनकार नि करूणु।
हमरि एक ही लड़कि छः, वीं का वास्ता कभी नी हूँणि चैन्दा, घर कु काम काज लकड़ी, घास, कुटुण, पिसणु व नि जणदि। चुल्ला, चौको, खाणो बणाणों आन्दु ई छः वीनंा परदेश मा ही खायि सकणा, ये वास्ता जो भी बीतली, देखि ल्यूँला- कर्जा पत्ता गाड़ी का निभाइ ल्यूँलां पर इनु ता बताओं कि ऊँना लड़कि कि जन्म पत्रि भि मंगाई कि ना? ‘‘
सीताराम ना बोले- ‘‘सावित्री? जन्म पत्रि भि मीन भेजियाल, मीलि भि ग्याई पर ऊ लोग लड़कि थैं देखणां चांणा छै। ओ लोग यख आणकु विचार करणा छया पर मीना सोचे यख हमारि हालत क्या छ। ये वास्ता मीना ऊँको पत्र लिखे कि दिल्ली लोदी रोड़ मा हमारो मित्र कैलाश रैन्दा, तखी लड़की आई जाली, तुमरा पसन्द आई जाली ता तखी सगाई होई सकदा, मीना – तेरा भाई कैलाश का वास्ता भी चिट्ठी देई यालि। बात ता यख तक पहंुचि ग्ये, पर डर लगणी छः द्वी वतु कि – एकता लड़कि सांवला वरण कि छः। दूसरो खर्चा भौत चैंदा।” क्वी बात नी छः तुम धीरज धरौ। एक लड़कि त कुल छ, वीं का वास्ता सब कुछ ह्वे जालों।” सावित्री ना सीताराम को धीरज देया। सीताराम ना बोले – तु तय्यार छई ता ठीक छः आज पन्द्रा जनवरी होई गई, छब्बीस जनवरी देखणा का सिलसिला मा मीना ऊँका वास्ता लिखी रये, दस दिन रई गई। अपणा लत्ता कपड़ा सौ सामान तय्यार करिले। अपणी ‘नथुली’ भि दे दे वैकि द्वी अंगूठी बणाई द्यूला। वाकी सामान दिल्ली- कैलाश का बोलणा पर वखी लेई ल्यूंला, वख का रीति रिवाज न मालूम क्या क्या छई? देखी ल्यूंला।’’ बीस जनवरी का दिन सीताराम अपनी पत्नी का साथ लड़की सुशीला को लेई का दिल्ली अपणा मित्र कैलाश का क्वार्टर मा लोदी रोड पहुँची ग्याई।
कैलाश का परामश्र से सगाई को सभी सामान तय्यार करी देया। सुशीला को भी सुन्दर वस्त्रों मां सजाई का क्रीम पाउडर लगाई का तय्यार करी देया। समधी, समधिन जवाई सब ना लड़की पसन्द करी का सगाई की रशम् अदा करी देया। सगाई मा सज्जा सामग्री बर्तन, अंगूठी, वस्त्र, मिठाई-पिठाई सुन्दर करी देया। खान-पान, खातिरदारी मा भी काफी खर्च करणा पड़े। जैका कारण वर पक्ष सन्तुष्ट होई का विदा होई गया पर जांदा वक्त समधीना अवश्य बोेले कि – शादी को दिन वैशाख मा ही निश्चित होई जालो, शादी दिल्ली मा ही होली। आपकी हमारी प्रतिष्ठा को प्रश्न छः आप मा ज्यादा क्या बोलणा?‘‘ ये प्रश्न से सीताराम का दिल मा कुछ चश्का सी पड़ी गये, पर क्या कर दोत्र बेटी की शादी को सवाल छई। सोच मां पड़ी गये, शादी होणा का केवल तीन महीना रई गई। न मालूम क्या बीतली?
छब्बीस जनवरी देखी का सीताराम अपनी पत्नी व पुत्री लेई का घर पहुँचि, शादी की तय्यारी मा लगी गई जो भी जर जेवर सावित्रि का पास छया ऊँका नया ढंग का जेवर बेटी का वास्ता वणाई देई। कर्जा पत्ता करी का तीस हजार रूपया जमा होया। वाकी खर्चा जो भी होलों, कैलाश की मदद की आशा करीका व्याह का वास्ता अपणों ताम झाम लेई का फिर दिल्ली चली गई। वैषाख 10 गते को शादी को दिन छयों। अपणी सामर्थ्य का अनुसार सभी दहेज सामग्री तय्यार छई, कैलाश ना भी मामा की हैसियत से बड़ी मदद करे। शादी भली प्रकार सम्पन्न भी होई गया पर वर पक्ष संतुष्ट नी लगो, सीताराम, सावित्रि ना अपणो सर्वस्व लड़की की शादी मा लगाई का भी जब वर पक्ष संतुष्ट नी देखो ता ऊँका बड़ो दुख होया, पर क्या करदा।
मलीन मन से रूँदी धूँदी एकलौती लाडली सुशीला को वर का हाथ मां सौंपी का घर आई गई। पर लड़की का विछोह का साथ-साथ वर पक्ष की उदासीनता देखी का ऊँकों दिल टूटी गया। उदास जीवन बणी गया। पर अपणो दुख बाहर प्रकट नी करदा छया। अपणा सर्वस्व लगाई का भी बेटी को सुखी जीवन होई जान्दो ता ऊँको सन्तोष व सुख को अनुभव हूंदों, पर दिल्ली मा न मालुम ‘बेटी कनी हालत मा होली?
ब्याह का दिन ही समधी समधिन जवाई को रूख अच्छो नीं छये, लड़की का साथ ऊँको कनो व्यवहार होलो। यां की चिन्ता मा सीताराम, सावित्रि रात दिन झूरदा रैन्दा, कुछ दिन तक ससुराल से लड़की का पत्र की प्रतीक्षा करणा रई, पर तब एक मैंना तक भी लड़की कु पत्र नी मिलों, ता ऊँकी चिन्ता और भी बढ़ी गया ऊँना अपणा आप भी पत्र देया पर वैकों जबाव नी मिलो फिर और पत्र दीन्दा रईं पर उत्तर कुछ भी नी मिलदो छयो। जै का कारण ऊँको जीवन ही नीरस व चिन्तित हालत मा बीततो रैन्दो। सीताराम बोलदो- ‘‘देख ले सुशीला की माँ! बोलो छयो तनी होया, तीना ही जोर दिया। अब लड़की की चिन्ता मा पछताणों छवां।‘‘ सावित्रि लड़की का विछोह व अनिश्चित जीवन का कारण रात दिन आँसू बहाणी रैन्दी, पर ऊँका पास पश्चाताप का अलावा अब क्या रई गैछो?
शादी का दिन सुशीला बड़ी खुश छई। दिल्ली मा भला परिवारा व सुन्दर पति मिलणा की खुशी मा अपणें भाग्येदय की कल्पना करदी करदी ससुराल पहुचि गया। ब्याह की औपचारिकता सभी सुन्दर ढंग से निभी गई, पर सासू व ससुर से मां बाप का समान प्यार पाणा की जो आशा सुशीला को छई व देखणा मा नी आयी। अपना पति ‘दिनेश’ को प्यार भी प्राप्त नीं होई सको। ऊँका रूखा व्यवहार ना सुशीला की आशा तमन्ना व ब्याह की खुशी की उमंगों पर पाणी फेरी द्याई। ससुराल मा सब कुछ होणा पर भी वींको प्यार कैका तरफ से नी मिली सको। सीधी साधी पहाड़ी माँ-बाप की पहाड़ी इकलौती बेटी सुशीला बाजारी रीति रिवाजों से बिल्कुल अपरचित हुई गुपचाप गुमसुम आँसू बहान्दी रैन्दी, सासू की तीखी नजर व कठोर आज्ञाओं की झिड़की सुणदा सुणदा वींका दिल मा बड़ो डर भरी गया। वींको काम-चौका बर्तन करणो, कपड़ा धोणा, झाडू लगाणो, खाणा बणाणों सभी प्रकार से व्यवस्तता पूर्ण छयो। जरा भी वींको आराम नी मिलदो, वींका उठणा बैठणा चलणा फिरणा, खांणा पींणा कपड़ा पैरणा आदि सभी बातों की परविार मा मुख मड़काई का उपेक्षा हूणी रैन्दी छई, जैका कारण वंींको अपणा जीवन पर बड़ी ग्लानि आन्दी, पर क्या करदीं? आँसू पोंछदा पोंछदा सारी उपेक्षा सहणी रैन्दी छई रसोई घर की ही चहारदीवारी मा वींको रैन बसेरा छयों, वखी एक झीली खाट मा दरी चादर का अन्दर मुख छिपाई याद करदी, पर अब वो दुर्लभ प्यार ता स्वप्न होई गैचौ। क्या करदी लाचार छई, वींको एक कैछी को जीवन होई गैछौ। शादी मा ‘स्कूटर’ ‘टेलीविजन’ आदि मूल्यवान सामग्री नी मिलणा पर सास ससुर व दिनेश सभी नाराज छया। सासू ताना सुणादी रैन्दी, वींका मां बाप को कमीना, कंजूस नंगा आदि घृणित शब्दों से कोशदी रैन्दी, जांका कारण वींकों दिल छलनी छलनी होई ग्याय।
पति दिनेश भी वींको सांवलों रंग, पहाड़ी सीधो साधो ढंग व दहेज मा इच्छित सामान नी मिलणा का कारण पत्नी को प्यार नी देयो सको। मा बाप का बोलणा पर शादी ता करी देया पर वैना दिल्ली शहर मा ही कई बाजारी, सजी सजाई साथ पढ़ी लिखी लड़कियों पर अपणा प्रेम का डोरा भी डाला छया। अब ओ ओवरयिर भी बणी गैछो। शहरी सभ्यता वाली पत्नी पाणा की वैकी तमन्ना छई ‘सुशीला’ से तैकी तमन्ना पूरी नी होई सकी। जैका कारण पति से भी वींको उपेक्षा ही मिले। सासू की बातों ना वैथै और निर्दयी बणाई द्याई। जैका का कारण ऊँका विलगाव ही होई ग्यायी। इनी उपेक्षिता दुखी सुशीला को माँ-बाप की याद आन्दी, ऊँको प्यार दुलार अब दुर्लभ होई गैचो पर उम्मीद बची छै कि कभी फिर ऊँका दर्शन करणा को अवसर मिलदो ता तों मा अपणो दुखड़ा सुणाई कि आशा पर वा दिन कटदी रया।