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बिना भाषाई पछ्याण का हर्चिग्ये उत्तराखण्ड

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अपणा स्वााभिमान का वास्ता , हक का वास्ता उत्तराखण्ड  का गौं-गौं मा कतगैं उदाहरण आज बी गीत  रूप मा ज्यूंदा छन, वौ चाहे आदिकाल हो ,राजा-रजवाड़ों को बग्त हो , अग्रेंजों को शासन हो या चीन-पाकिस्तान की लणैं होवन। इना इलाका की आज की स्थिति पर द्यखण से बड़ी निराश होंद। जैं स्वतंत्र अर सम्पन्न सांस्कृतिक विशेषता को रूणो रूएण्यों छ , वां पर शिक्षा की शुरूआती प्रणालीन सबसे ज्यादा हमला करे। जो शिक्षा आज या पैलि बटि यख दिएणी छ ,वा कै बी मामला मा यख का अनुकूल नी छ। उदाहरण का वास्ता क से कबूतर, ग से गधा ट से टमटम ठ से ठठेरा से होेंण वाल़ी शिक्षा का बाद पाताल तोड़ कुआं अर रहट का पाठ पढ़ाए जांदन ,त मय्या मोरी मैंनहि माखन खायो की घुट्टि बी पिवाए जांद। स्कुल्या बि द कन मोरी मय्या बोलिकै  ई शिक्षा प्रणाली को ठट्ठा लंगादन। पहाड़ का शहर-कस्बौं कि बात छोड़ि द्यां त ग्रामीण अंचलों का नौन्याल़ भौत कुछ नि जाण्दा , किलैकि तौंन देखेइ नी छन। शिक्षा की सामग्री बी केवल मैदानी इलाका का लोगों का वास्ता बणाएग्ये अर पडाड़ मा बी लादे ग्ये। यूं शहरों बटि छपेण वाल़ी किताब्यों मा राणा प्रताप , अकबर , लक्ष्मीबाई त रैंन पर पुरिया नैथाणी ,तीलू रौतेली , माधो भण्डारी जना देशभक्तौं की कहानी नि रैंन। श्याम सुन्दर दास , प्रतापनारायण मिश्र , भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , रामचन्द्र शुक्ल का पाठ त पढ़ाए गैंन पर आत्माराम रौतेला , हरिकृष्ण रतूड़ी ,भवानी दत्त थपल्याल ,विश्वम्भर दत्त चंदोला , गौर्दा, गुमानी पंत ,चंद्र कुंवर बर्त्वाल आदि का जीवन-परिचय अर साहित्यिक सेवा का पाठ नि पढ़ाए गैंन। शिक्षा-प्रसार का बाद , पैलि-पैलि हाईस्कूल, इण्टर अर अब ग्रेजुएट आदि मैदानों की तरफ अटगणा रैंन त शहरों कि चकाचौंध मा कुछ त हर्चि गैंन। कुछ हर्चणा खतरा मा बच्यां छन पर जौंन रोजी-र्वटि को जुगाड़ करे वो (पहाड़) पुश्तैनी घर अर शहर की बसागत का बीच मा पिसेण्यां छन । जो वर्ग या जो लेाग पूरी तंरा शहरों का रैबासी ह्वैं गैंन ,पहाड़ से सम्पर्क  खत्म करि याले उंकि बात अलग छ फिर  बी कम से कम शहरों मा रैण्ंा वाल़ा ए लोग पहाड़ उत्तराखण्ड अर उत्तराखण्डी संस्कृति से जुड्यां रैंण  चांणा छन, थ्वड़ा भौत पारम्परिक बी छन। पर जो बच्चा मैदानों मा ही पैदा होणा छन, जौंन उत्तराखण्ड देखो नी अर न भोगे ही वेा सिर्फ जात्यों का आधार पर उत्तराखण्डी ब्वलेण्या छन, अर मूल निवास प्रमाणपत्र ही लेणा छन। उत्तराखण्ड का भितर रैंण वालौ़ कि बात त जनो हमन पैलि बोले कि शिक्षा की दूषित अर अनफिट प्रणाली का कारण तख अपणौं तैं दुर्याणो अर भैर की चीज तै अंग्वाल़ ब्वटणा मा बड़प्पन को अनुभव करेण्यों छ। ई तथाकथित शिक्षा-प्रणाली अर शिक्षा प्रसार की दोषपूर्ण नीति से उत्तराखण्ड हिमालय को भौत नुकसान ह्वै अर होणई लग्यूं छ। अगर यखै पछ्याण्ंा बचांण-बतांण वाल़ी शिक्षा प्रणाली शुरू नि करेग्ये त दगड़ मा यख का वास्ता लाभदायक शिक्षा बी त नि दिएग्ये ?
एक छ्वटु सि उदाहरण छ। उत्तराखण्ड मा कृषि विभाग का अंतर्गत किसम-किसम का दफ्तर अर तौेंमा किसम-किसम का पद इन्सपेक्टर बटि अफसर अर विशेषज्ञ तक छन। पर क्या मजाल जो एक बी अफसर अर विेशेषज्ञ एक बी कृषि अधिकारी , गन्ना अधिकारी ,चारा अधिकारी  या हार्टिकल्चर अधिकारी ,इन्सपेक्टर उत्तराखण्ड मूल का होवन । मेरठ , मुजफ्फरनगर , गाजियाबाद , बुलंदशहर या फिर हटावा-मैनपुरी का यूं अफसरोैं से कृषि विकास , फलोत्पादन ,साग-सब्जी उत्पादन मा बढ़ोत्तरी का वास्ता सकारात्मक भूमिका की उम्मीद कनकै करे सकेंद ? यूं तैं यखा भूगोल , जलवायु , मौसम , मिट्टी अर  सांस्कृतिक जीवन की जानकारी ही नि रैंदी । वो त सिर्फ नौकरी कर्दन ,मोटी तनख्वाह , भत्ता लेकै विकास का आंकड़ौ मा हेर-फेर कर्दन। असंल दुर्भाग्य कि बात या बी छ कि उत्तराखण्ड का तेरह जिलों मा एक बी कृषि विश्वविद्यालय नी छ , सिवाय पंतनगर का गोविन्द बल्लभ पंत कृषि व प्रौद्योगिक  विश्वविद्यालय का – जख कि आम आदमी का नौन्याल़ प्रवेश पंाणै गाणी बि नि कैरि सकदा। कृषि विभाग मा कृषि से संबधित तकनीकी पदों का वास्ता बी.एस.सी.(कृषि) की शिक्षा जरूरी होंद। कतगा भलो  होंदो कि हे.न.बहुगुणा गढ़वाल़ विष्वविद्यालय अर कुमाउं विश्वाविद्यालय मा बी.एस.सी(कृषि) की पढ़ै कराए जांदी।
गढ़वाल़ी विश्वविद्यालय का कर्ता-धर्ता त पत्रकारिता जना भैरगडा कोर्स कंराण मा ही दिलचस्पी लेंदन। धकाधक  डिप्लोमा बांटि कै पत्रकारों कि फौज तयार कना छन ,शहरों का धक्का खाणा वास्ता ?
उत्तराखण्ड मा प्रारम्भिक शिक्षा प्रणाली अर रोजगार मा मददगार साबित होंण वाल़ी  अगनैं कि पढ़ै-लिखै का अभाव मा जो हाल होणा छन वो जगजाहिर छन। राजनेता  पलायन का रूणेां त र्वै सकदन पर अपणि  कोठी-काठी ,लखनौ- देहरादून- दिल्ली मा ही बणांदन। लोकहित की भावना से न त क्वी योजना बणदी अर न वांको कार्यान्वयन ही होंदो।
अधूरी-अधकचरी शिक्षा प्रणाली का बाद गढ़वाल़ हिमालय याने सर्रा उत्तराखण्ड पर एक औरि हमला करेण्यौं छ ,पर्यटन का नौं पर ।
दरअसल उत्तराखण्ड तैं स्विटजरलैण्ड से बिण्डि आकर्षक ,द्यखण लैक प्रचारित कैरिकै दिल्ली-बम्बई का धन्ना सेठ बड़ा-बड़ा होटल यख बणै कै बिण्डि मुनाफा कमाण चांणा छन ,अर उंकि ई बदमाशी ,दलाली मा सरकारी विशेषज्ञ-अफसरों की पूरी मिली भगत छ। अबि तक का पर्यटन विकास से नेता अफर , सेठों की तिगड़ी तै जो फायदा ह्वै होलो वो अलग बात छ पर उत्तराखण्ड का आम आदमी तैं क्या फायदा ह्वेै ?
भले ही पर्यटन विकास का मूल मा ,स्थानीय लोगों की भलै की बात रै हो  ,रोजगार कि बात रै हो पर वास्तव मा क्या भलै अर कनो रोजगार । क्या सेठों का बड़ा-बड़ा होटलों मा किसम-किसमें वर्दी पैरिकै ही रोजगार का सरकारी आंकड़ों की खानापूरी ह्वै सकद?
पहाड़ का लोगों तैं पर्यटन विकास का भरमाण वाल़ा नारौं का दम पर कौड़ियों का मोल उंकि जमीन हत्ये कै कनो विकास अर कनो पर्यटन होलो यांकि गांणी करे सकंेदन।
उत्तराखण्ड हिमालय का धार्मिक-आाध्यात्मिक अर प्राकृतिक स्वरूप तैं आधुनिक पर्यटन की भोगवादी प्रवृत्ति का तरफ ठंेलणै कोशिश पहाड़ अर यखा वाशिन्दों का वास्ता ठीन नि छन। उत्तराखण्ड तैं उत्तराखण्ड ही रैण दिण चयेंद। पर्यटन विकास का नौं पर भैर का गुण्डा, बदमाश ,मुनाफाखोर सेठों तैं यख बसण से रोके जांण चयेंद। आत्याधुनिकता की आड़ मा उत्तराखण्डै शांत घाट्यों ,पवित्र तीर्थस्थलों मा कूड़ा-कर्कट ,कांच अर प्लास्टिकै बोतलों का थुपड़ा लगणा बंद करे जांण चयेंदन।
देहरादून-दिल्ली का एयरकंडीशंड दफ्तरोै ं मा बैठ्यां सत्ता का दलालों द्वारा उत्तराखण्ड बिकाणै साजिश बंद करंे जाण चयेंद। 

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